योग क्या है | योग की 6 शाखाएँ

योग मन और शरीर का अभ्यास है। योग की विभिन्न शैलियों के द्वारा शारीरिक मुद्राओं, साँस लेने की तकनीक और ध्यान को आपस में जोड़ा जाता हैं। सर्वप्रथम योग की प्रथा भारत में शुरू हुई थी। योग के द्वारा मानसिक और शारीरिक समस्याओ को दूर किया जाता है।

योग क्या है?

योग एक आध्यात्मिक प्रक्रिया है जिसमें एकाग्रता के साथ शारीरिक मुद्राये करने के साथ-साथ गहरी साँस लेना शामिल है। नियमित योगाभ्यास के द्वारा शरीर में शक्ति, शांति, लचीलापन जैसे कई गुणों का विकास होता है। वर्तमान में योग दुनिया भर में लोकप्रिय है।

योग का इतिहास

“योग” शब्द का पहला उल्लेख “ऋग्वेद” ग्रंथ में मिलता है। योग संस्कृत के “युज” शब्द से बना है, जिसका अर्थ है “संघ” या “जुड़ना”। योग की शुरुआत 5,000 साल पहले उत्तर भारत में हुई थी।

भारतीय लोगो ने 1890 के दशक के अंत में पश्चिमी देशों में योग का प्रसार करना शुरू किया और 50 वर्षो में ही योग पश्चिमी देशों व्यापक रूप से लोकप्रिय हो गया।

योग की शाखाएँ

योग की कुल छह शाखाएँ हैं। मतलब योग करने के 6 तरीके है। योग करने का मकसद सिर्फ एक ही है लेकिन इन्हें करने के अलग-अलग तरीके है।

1. हठ योग

हठ योग में बल पूर्वक शारीरिक क्रियाये करके शरीर को साधारण से असाधारण बनाया जाता है। हठ योग में मुख्य रूप से यम, नियम और आसन पर ध्यान दिया जाता है।

2. राज योग

महर्षि पतंजलि के योग को ही राज योग या अष्टांग योग कहा जाता है। इसके आठ अंग होते है – यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि। राज योग में मुख्य रूप से आसन, प्राणायाम और ध्यान पर जोर दिया जाता है।

3. कर्म योग

कर्म योग में व्यक्ति के कर्म को प्रधान माना गया है इसमें दूसरो की सेवा करके बढ़िया कर्म करने पर जोर दिया जाता है। यह सेवा आप किसी मंदिर, मस्जिद या गुरुद्वारे में भी कर सकते है

4. भक्ति योग

भक्ति योग में किसी भी भगवान की मूर्ति की भक्ति करने को प्रधान माना गया है भक्ति योग आप अपने घर पर या किसी मंदिर में जाकर भी कर सकते है।

5. ज्ञान योग

ज्ञान योग में व्यक्ति को धर्म ग्रंथो का अध्ययन करके अधिक से अधिक ज्ञान हासिल करने पर जोर दिया जाता है। ज्ञान के द्वारा व्यक्ति के चरित्र का विकास होता है और मोक्ष प्राप्ति का मार्ग खुलता है

6. तंत्र योग

तंत्र योग में मंत्रों का उच्चारण करने, शादी, हवन जैसे अनुष्ठान कराने पर जोर दिया जाता है।

शरीर के सात चक्र

हमारे शरीर में सात चक्र होते है “चक्र” का अर्थ होता है “चरखा”। हमारे शरीर में स्थित चक्र ऊर्जा हमारे विचार, भावनाओं और भौतिक शरीर का केंद्र बिंदु हैं। चक्र ऊर्जा के द्वारा ही यह निर्धारित होता है कि व्यक्ति भावनात्मक, इच्छाओं, आत्मविश्वास और शारीरिक लक्षणों के स्तर पर कैसा व्यवहार करता है।

शरीर में स्थित किसी भी चक्र की ऊर्जा जब अवरुद्ध हो जाती है, तो यह शारीरिक, मानसिक या भावनात्मक रूप से असंतुलन को पैदा करती है जिसके कारण व्यक्ति में चिंता, सुस्ती या खराब पाचन जैसे लक्षण प्रकट होते है।

योग के द्वारा इन सातों चक्रों को बैलेंस किया जाता है। किसी भी असंतुलित चक्र को संतुलित करने के लिए योग के विभिन्न आसनों की सहायता ली जाती है।

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सात चक्रों के नाम

1. सहस्रार चक्र

सहस्रार चक्र को मुकुट चक्र भी कहा जाता है यहाँ हमारे सिर पर मुकुट की तरह विद्यमान रहता है।

2. अजना चक्र

अजना चक्र दोनों भौंहों के बीच स्थित होता है इसे तीसरा नेत्र भी कहा जाता है।

3. विशुद्ध चक्र

विशुद्ध चक्र गले में स्थित होता है अगर लोग आपकी बात नही मानते और उन पर आपकी बातों का कोई असर नही होता तो इसका मतलब है कि आपका यह चक्र असंतुलित है

4. अनाहत चक्र

इसे हृदय चक्र भी कहा जाता है जो की हमारी छाती के केंद्र में स्थित होता है दुनिया के प्रति सम्मान और प्रेम की भावना इसी चक्र के द्वारा जाग्रत है।

5. मणिपुर चक्र

यह चक्र पेट के मध्य भाग में स्थित होता है। इस चक्र के द्वारा व्यक्ति को जीवन में मान-सम्मान, धन-दौलत की प्राप्ति होती है और व्यक्ति का आत्मविश्वास भी बढ़ता है।

6. स्वाधिष्ठान चक्र

स्वाधिष्ठान चक्र नाभि के 2 इंच नीचे स्थित होता है। यह चक्र व्यक्ति के जीवन में किसी भी काम को करने का जुनून पैदा करता है।

7. मूलाधार चक्र

मूलाधार चक्र रीढ़ की हड्डी के सबसे निचले हिस्से पर स्थित होता है। जिस व्यक्ति का यह चक्र संतुलित होता है उसे जीवन में किसी भी प्रकार की बीमारी नही होती है।

निष्कर्ष

इस लेख में आपने योग क्या है योग की 6 शाखाओ के बारे में जानकारी हासिल की है।

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