Swami Vivekananda Biography In Hindi/ स्वामी विवेकानन्द की जीवनी

“आप जब तक ख़ुद पर विश्वास नहीं कर सकते, तब तक आप भगवान पर भी विश्वास नहीं कर सकते हैं।”

                                                                                                                                    – स्वामी विवेकानंद

स्वामी विवेकानन्द आज न सिर्फ हिंदुस्तान बल्कि दुनिया भर के लोगो के लिए प्रेरणास्त्रोत के रूप में जाने जाते हैं I बेहद कम उम्र में ही दुनिया को अलविदा कहने वाले विवेकानंद जी ने दुनिया को धर्म का जो पाठ पढ़ाया और युवाओ को जिस सच्चाई के मार्ग पे चलने का सन्देश दिया वो मार्ग आज भी अमर है I इसके साथ ही विवेकानंद जी भी अपने विचारों और संदेशो के माध्यम से दुनिया के बीच सदैव अमर रहेंगे I साल 1893 में शिकागो के धर्म संसद सम्मेलन में उन्होंने जो भाषण दिया था, उसके लिए आज तक उन्हें दुनियाभर में याद किया जाता है।  अपने संदेश और शान्ति कार्यो के लिए स्वामी जी को ना सिर्फ़ भारत मे बल्कि दुनिया भर में सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। योग को दुनिया भर में एक अलग पहचान दिलाने का श्रेय स्वामी विवेकानंद जी को ही जाता है। इसी कड़ी में आज के इस पोस्ट स्वामी विवेकानन्द बायोग्राफी इन हिंदी (Swami Vivekanand Biography In Hindi)  के माध्यम से हम आपको स्वामी विवेकानन्द जी के जीवन से जुडी कुछ ख़ास बातें आपको बताने वाले हैंI

आइये सबसे पहले विवेकानन्द जी के जीवन पर एक हल्कीनज़र डाल लेते हैं- 

साल 1863 – में कोलकाता में जन्म हुआ। 
साल 1880 – में नवा विधान को अपना लिया।
साल 1884 – मे स्वामी रामकृष्ण के शिष्य बने।
साल 1886 – में रामकृष्ण मठ की स्थापना की।
साल 1893 – में विश्व धर्म संसद में भाषण दिया।
साल 1897 – मे रामकृष्ण मिशन की स्थापना की।
साल 1902 – में इस दुनिया को सदा के लिए अलविदा कह गए।

स्कॉलर सन्यासी- 

स्वामी विवेकानंद जी के बचपन का नाम नरेन्द्र दत्त था। उनका जन्म 12 जनवरी 1863 को कोलकाता में हुआ था। उनके पिता का नाम श्री विश्वनाथ दत्त था जो कि कलकत्ता हाईकोर्ट में अटॉर्नी थे। विवेकानंद जी की माँ का नाम भुवनेश्वरी देवी था, वो बेहद धार्मिक स्वभाव की महिला थी। स्वामी विवेकानंद जी का जन्म कोलकाता के जिस घर मे हुआ था आज उसे एक संग्रहालय का रूप दे दिया गया है। स्वामी जी 8 भाई बहनों के बीच पले-बढ़े थे। बचपन से ही वो बड़े धैर्यवान और गम्भीर स्वभाव के थे।
साल 1871 में जब स्वामी जी की उम्र मात्र 8 साल थी तभी उनका प्रवेश कलकत्ता के ईश्वर चन्द्र विद्यासागर इंस्टीट्यूट में करा दिया गया था। साल 1879 में उन्होंने प्रेसिडेंसी कॉलेज में प्रवेश लिया, लेकिन कुछ समय बाद ही इसे छोड़ दिया। इसके बाद उन्होंने जनरल असेम्बली इंस्टीट्यूट में प्रवेश प्राप्त किया, जो कि अनं स्कॉटिश चर्च कॉलेज के नाम से जाना जाता है। साल 1881 में उन्होंने फाइन आर्ट की परीक्षा पास की और फिर साल 1884 में उन्होंने आर्ट की डिग्री भी हासिल कर ली। स्वामी विवेकानंद जी बहुत ही विद्वान छात्र रहे थे। उनके पास दर्शनशास्त्र, धर्म, इतिहास, सामाजिक विज्ञान, कला और साहित्य के क्षेत्र का अपार ज्ञान था।

धर्म, शांति और योग की यात्रा- 

साल 1880 में नरेन्द्र नाथ जी ने रामकृष्ण के सिद्धांतों पर चलते हुए ‘नव विधान’ को अपना लिया। बाद में वो साधारण ब्रह्म समाज के सदस्य भी बन गए, जो कि ब्रह्म समाज का ही एक हिस्सा था। साल 1881 में वो पहली बार रामकृष्ण जी से मिले और फिर 1884 में उन्हें अपने गुरु के रूप में स्वीकार कर लिया। स्वामी विवेकानंद जी अपने गुरु रामकृष्ण के विचारों से काफ़ी ज़्यादा प्रभावित हुए। बाद में रामकृष्ण जी की मृत्यु के पश्चात स्वामी विवेकानंद जी ने साल 1886 में रामकृष्ण मठ की स्थापना की। इसके बाद साल 1897 में उन्होंने रामकृष्ण मिशन की भी नींव रखी। साल 1888 से लेकर 1893 के बीच स्वामी जी ने पूरे भारत देश मे पदयात्रा करते हुए धर्म और शांति का सन्देश फैलाना शुरू किया। साल 1893 के बाद उन्होंने भारत से बाहर जाकर भी लोगो को शान्ति और हिंदुत्व का सन्देश देना शुरू कर दिया था।

धर्मगुरु होने के साथ ही स्वामी विवेकानंद जी एक अच्छे विचारक, बेहतरीन लेखक, प्रभावी वक्ता और सच्चे देशभक्त भी थे। उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन गरीबों और पिछड़ों की मदद और उनके उत्थान में समर्पित कर दिया। आज के समय मे पश्चिमी देशों में भी योग और हिंदुत्व को जो सम्मान मिल रहा है, सही मायने में ये सब स्वामी जी की ही देन है। उनके द्वारा शुरू किए गए रामकृष्ण मठ और रामकृष्ण मिशन में आज दुनिया भर के 180 संस्थाओ में लाखों विद्यार्थी अध्ययन कर रहे हैं।

शिकागो वाला भाषण- 

धर्म और शांति के प्रचार प्रसार की यात्रा के दौरान ही स्वामी जी को एक बार अमेरिका के शिकागो शहर जाने का अवसर प्राप्त हुआ I स्वामी जी ने 1893 में शिकागो के विश्व स्तरीय सम्मेलन का निमन्त्रण स्वीकार कर लिया और मई में बॉम्बे से रवाना हो गए I वो पहले जापान गए फिर वहां से यूनाइटेड स्टेट गएI  विवेकानंद शिकागो में हिन्दू धर्म के प्रतिनिधि के रूप में सम्मिलित हुए थे और वहाँ उन्होंने वेदों और उपनिषदों का व्याखायान दिया थाI 11 सितम्बर 1893 को विवेकान्द ने अपने पहले भाषण में स्टेज पर पहुचकर  पहले माँ सरस्वती का वंदन किया फिर उन्होंने अपना व्याख्यान शुरू कियाI उनके व्याख्यान की प्रथम पंक्ति थी “मेरे अमेरिकन भाइयों और बहिनों” इतना सुनकर पूरा सभागार तालियों के शोर से गूंज उठाI  विदेशियों के लिए इतने आत्मीयता से किसी भी धर्म के विद्वान का  भाषण की शुरुआत करना पहला अनुभव था I वहाँ भीड में मौजूद लगभग 7000 लोग उनके सम्मान में उठकर खड़े हो गयेI

आगे उन्होंने कहा आपके अभिनन्दन से मेरा हृदय प्रसन्नता से भर उठा हैं, मैं आप सबका विश्व की सबसे पुरानी सभ्यता की तरफ से आभार प्रकट करता हूँ I  विवेकानंद जी के उद्बोधन में सभी धर्मों के प्रति सम्मान का भाव था I इस सम्मेलन को कवर करने वाली मीडिया ने उन्हें एक सबसे अच्छा वक्ता माना जिसने श्रोताओं को मंत्र-मुग्ध कर दिया था I

जब एक महिला ने स्वामी जी से शादी करने की इच्छा जतायी- 

स्वामी जी ने हमेशा आत्मसम्मान और औरतों का सम्मान बढाने और उन्हें समाज मे एक अच्छी पहचान बनाने की दिशा में काम किया था। उनके जीवन के बहुत से ऐसे रोचक किस्से सुनने को आये हैं जिनमे स्वामी जी का आदर्श व्यक्तित्व झलकता था। एक बार जब स्वामी जी विदेश में थे तो वहाँ पर एक महिला ने उनसे शादी करने की इच्छा रख दी। इस पर स्वामी जी मे उस औरत से पूछा- तुम मुझसे ही क्यों शादी करना चाहती हो? क्या तुम नहीं जानती की मैं एक सन्यासी हूँ?
इस पर उस विदेशी महिला ने कहा- मैं चाहती हूँ कि मेरा बेटा भी आप ही के जैसा शान्त और विद्वान हो, ऐसा पुत्र मुझे तभी मिल सकता है जब मैं आपसे विवाह करूँगी।
इस पर स्वामी जी ने उस औरत से कहा- नहीं… ऐसा संभव नही है की मैं आपसे शादी कर लूँ। लेकिन अगर आप मेरे जैसा बेटा पाना चाहती हैं तो आज से आप मुझे अपना बेटा ही समझे। मैं भी आज से आपको माँ की तरह मानूँगा।


इसके बाद वो महिला स्वामी जी के चरणों मे गिर पड़ी।  उसने कहा- आप सच मे भगवान का रूप है। आप एक आदर्श व्यक्ति है जो कि हर किसी महिला के भीतर माँ का रूप देख सकते हैं।
इसी तरह से स्वामी जी के जीवन की लगभग सभी घटनाएं हर किसी के लिए ज्ञान और प्रेरणा का स्त्रोत साबित हो सकती हैं। इसी वज़ह से स्वामी जी को ना सिर्फ़ भारत के बल्कि सम्पूर्ण विश्व के युवा अपना आदर्श मानते है।

हर किसी के प्रेरणास्त्रोत- 

भारत मे आज भी उनके जन्म दिन को हर साल राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। साल 1984 में युवाओं को प्रेरित करने के लिए और स्वामी विवेकानंद जी के बताये हुए रास्ते पर आगे बढ़ने का संदेश देने के लिए ही भारत सरकार द्वारा ये फ़ैसला लिया गया था। साल 1984 से ही प्रत्येक वर्ष उनके जन्मदिन को स्कूलों और कॉलेज में ख़ास दिन के रूप में मनाया जाता है। इस दिन स्कूलों और कॉलेजों में विभिन्न तरह के खेल, योगा और भाषण प्रतियोगिताएं करायी जाती है।
स्वामी जी के जीवन की प्रत्येक घटना हर किसी के लिए प्रेरणा का स्त्रोत हो सकती हैं। स्वामी विवेकानन्द जी का जीवन आज भी करोड़ो लोगों के लिए प्रेरणास्रोत बना हुआ है।

मौत की भविष्यवाणी- 

स्वामी विवेकानंद जी ने बहुत पहले ही ये भविष्यवाणी कर दी थी कि वो 40 वर्ष से ज़्यादा नहीं जीवित रहेंगे। उनकी भविष्यवाणी बिल्कुल सही थी।

4 जुलाई 1902 को रात 9 बजकर 20 मिनट पर स्वामी विवेकानंद जी ने इस दुनिया को अलविदा कहते हुए समाधि ले ली थी।

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